एक हफ्ते की छुट्टी लेकर दोनों बेटियाँ घर आईं , चौथे दिन से ही उल्टी गिनती का अहसास होने लगा था , मन पहले डूबा , फिर हौले से तैर कर ऊपर आया और खुद को समझाते हुए जग से कदम मिलाते हुए चलने लगा | इस प्रक्रिया को इस कविता में सहज ही महसूस किया जा सकता है | भावुक मन की समझदारी भी इसी में है .....
बुलबुलें जाने लगी हैं
वीराने की आवाजें आने लगी हैं
मीलों चलना होता है सहराँ में
अपनी नमी घबराने लगी है
किनारे तोड़ने को फिर बहाने आ गए
बरसाती नदिया बेतहाशा छलकाने लगी है
खुद से अलग हो कर भी कोई चल है पाता
टुकड़ों में कोई रौशनी जगमगाने लगी है
चहचहाती हैं बुलबुलें यादों में
खुद को देखा , जिन्दगी लौट आने लगी हैं
लौट कर आयेंगे फिर से , फुसफुसाता है गुलशन
उम्मीद फिर बहलाने लगी है
इनके परों ने टोहना है आकाश को
मेरी बेड़ियाँ शर्माने लगी हैं