सोमवार, 16 नवंबर 2009

सबक अभी बाकी है

प्रेम ही रास्ता खोलता है , निर्मल आकाश का
वरना तंग गलियों में कहाँ गुजर बाकी है

छिल जाता है जिगर , घबरा के मुँह फेरता है जमीर
धड़कनें साँसों से कहती हैं , सफर अभी बाकी है


मोहरे बने हैं हम , खाता खुला है कर्मों के हिसाब का
जिन्दगी मुस्करा के कहती है , सबक अभी बाकी है


प्रेम की क्षीण किरण मुस्कराती है , हूँ तो लता सी
जान पे बनी है मगर , साँस लेने की ललक अभी बाकी है


सबक बाकी है , रात का कोई पहर अभी बाकी है
ललक बाकी है , आसमाँ की महक अभी बाकी है

सोमवार, 9 नवंबर 2009

सुन्दर सा ज्यों मुखड़ा कोई गुलाब का



नौ नवम्बर ०९ , आज बेटे का बीसवाँ जन्मदिन है , छोटा सा था जब माउन्ट आबू में बेटियों की राजस्थानी ड्रेस में फोटो खिचवाई थी , तो इन्हें भी कहा कि राजस्थान की पारम्परिक ड्रेस में एक फोटो खिंचवा लो ; सिर हिला कर कहने लगे कि नहीं ये नहीं पहनूंगा ,  फ़िर ख़ुद ही कहने लगे कि यहाँ पुलिस वाली ड्रेस भी है उसको पहनूँगा  ,ये फोटोग्राफ उस वक़्त का ही है।

ये कविता अमरउजाला के बच्चों वाले कॉलम के लिए लिखी थी , पर याद तो अपने ही बेटे को कर रही थी।   प्रस्तुत है .....

तू फूल है मेरे बाग़ का
सुन्दर सा ज्यों मुखड़ा कोई गुलाब का


पढ़ लिख के बन जाना
तू कोई नवाब सा


बन जाना तू प्रेम और
भाईचारे की मिसाल सा


मुश्किलों से न घबराना
सिपाही है तू जाँबाज सा


रास्ता तेरा महफूज हो
ममता की ठण्डी छाँव सा


तू मुस्कराता है , घर
खिल जाता है किसी बाग़ सा


महकाना तू दुनिया को
स्वर्ग सा , इक ख्वाब सा


बहारों को न्योता दे दिया
गुलशन को है इन्तजार सा


तू फूल है मेरे बाग़ का
सुन्दर सा ज्यों मुखड़ा कोई गुलाब का

बुधवार, 4 नवंबर 2009

सोने दे मुझे शब भर को

सोने दे मुझे शब भर को
कितनी है कीमत अपनों की
आराम की कीमत कितनी है
आँसू न कर पाये कीमत
उधड़ा है जिगर
सिलाई की कीमत कितनी है
सब्र कितने वक्त का , ये बता
ये सफर है या मुकाम
आड़े वक्त के साथी ,
क्या यही है मेरा ईनाम
सोने दे मुझे शब भर को

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

दीपमलिके



दीपमलिके , हम तेरे इन्तजार में
घर सजा के बैठे रहे
मन भी है सजता यूँ ही
इस बात से अछूते रहे
होती है दीवाली किसी की
उपहारों से भरी
हो जाते हैं उनमे ही गुम
और किसी की यूँ दिवाली
तेल है रुई बाती
हो जाए बत्ती ही गुल
स्वागत हैं करते जलते दियों का
है नहीं मोल जलते प्राणों का कोई
घर में हैं करते ढेरों प्रकाश
प्रार्थना करते हैं , बसें
स्थाई हमारे घर में श्री लक्ष्मी गणेश
मन नहीं करते हैं स्वच्छ
करें अंतरात्मा में प्रकाश
टिम टिम कर जलते दिये
छू लें जो मन का कोना
हजारों दियों सी हो रोशनी
कई पूनम सी हो जाए
अमावस की काली रात
मन भी है सजता यूँ ही
इस बात से अछूते रहे

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

अपना अपना जोग भया

दुख दारु सुख रोग भया
दारु दारु उन्माद हुआ

दुख न हुआ प्रमाद हुआ
गीतों में ढल कर शाद हुआ


किर्चों से मिल कर नाद हुआ
खुशबू में बँट आबाद हुआ


दुख दारु सुख रोग भया
अपना अपना जोग भया

शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

टिम-टिम करती मेरी आशा का


जुगनू की तरह मेरी आशा
बुन लेती है सन्सार पिया


मेरी आँखों में पाओगे
तुम अपना ही तो सार पिया


दिल में मैं छुपा के रख लेती
ये जग काँटों का हार पिया


अट जाये फूलों से रास्ता
ऐसा हो तेरा घर-द्वार पिया


छल किया है किस्मत ने मुझसे
कैसे कह दूँ इसे दुलार पिया


हर बार ये कहती जरा धूप है
ऐसा हुआ न पहली बार पिया


दुख पकड़ा नहीं , सुख ढूँढा किए
अपने हाथों में है सितार पिया


टिम-टिम करती मेरी आशा का
ये ही तो है विस्तार पिया



गुरुवार, 3 सितंबर 2009

निष्ठुर छल गया जीवन

एक मित्र के पिता के दुनिया से चले जाने के बाद , मित्र की माँ जब जब मुझे मिलीं रोईं जरुर , जैसे अतीत के गले लग आईं हों | क्या हमने कभी बुढापे की आँख से जिन्दगी को देखा है ?
जीवन के उत्तरार्ध को
जाता हुआ जीवन
साथी भी साथ छोड़ गए
निष्ठुर छल गया जीवन

काँपते हाथ और जज्बात
लाचार नहीं , आधार नहीं
मेरे हाथों में सँसार नहीं
यूँ गल गया जीवन

बोझ यादों का भी है
सीने में सुलगता दावानल
सैलाब है बहता आँखों से
है हिल गया जीवन

वो कौन सी चीज है
जो चलाती है जीवन को
डोर टूटी तो पतझड़ आ गया
निष्ठुर ढल गया जीवन