सोमवार, 15 दिसंबर 2008

इन्सानी से जज्बों के संग

खिलौना बन गये वहशत की ताकतों का
अपना जमीर सुला दिया , मजहब का मतलब ग़लत उठा लिया

बेशकीमती है ये , जिन्दगी को क्यों गिरा दिया
मशीनी इंसान की तरह , कहर क्यों बरपा दिया

तेरा लहू लहू है , क्या उसका लहू पानी है
जब होगी जिन्दगी , कैसे देखेगा अपने जनाजे के बाराती

सेहरा तेरा छलावा है , कफ़न लिए खड़े हैं , मोहरे बने तेरे साथी
अपनी कब्र खोद कर , ख़ुद ही कदम बढाया है

जो पाक-साफ़ है तो छुप कर के क्यों आया है
जो बो रहा है वही फसल तो काटेगा

कैसी शहादत है , दो गज जमीन को तरसे
खिलौना बन गया , कमान तेरी दूसरों के हाथ है

लता है तू जैसे रोबोट , माथे में बजते टेप के साथ है
वही तो पाते हैं न्यामतें , जिंदा हैं जिनकी रूहें ,इन्सानी से जज्बों के संग

चिराग बुझाए बैठे हो , उजाले का वहम पाल के ,
चलोगे कैसे इतने अंधेरों के संग

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008

सुनहरी किरणों के मालिक

सुनहरी किरणों के मालिक
उतरो , तुम उतरो

सुबहों की उजली रूहों में उतरो
इन्सां की खिलखिलाती हसरतों में उतरो
दुआओं को उठते हाथों में उतरो
प्रेम की सारी परिभाषाओं में उतरो

सुनहरी किरणों के मालिक
उतरो , तुम उतरो

सजदे को उठती निगाहों में उतरो
वफ़ा के सारे रंगों में उतरो
विश्वास के आँगन में उतरो
स्वाति नक्षत्र की एक बूँद को ,
तरसते हमारे दिलों में उतरो

सुनहरी किरणों के मालिक
उतरो , तुम उतरो

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

कविता को कहानी चाहिए

लेखक लोग कहते हैं ,कविता लम्बी चाहिए

आम तौर पर लोग कहते हैं , थोड़े में बात पते की चाहिए

रुक तो सही कुछ पल को ही ,थोड़ी जिंदगानी चाहिए

आदमी के दर्दे-इश्क को , इश्क की रवानी चाहिए

उठते हुए क़दमों को , जिगर की जवानी चाहिए

कुछ घूँट ही मिल जाये जो , जिन्दगी की निशानी चाहिए

चख तो ले तू स्वाद इसका , बहलने को बहाना चाहिए

दिल की उजड़ी बस्तियों को ,चमन सा बसाना चाहिए

बात तो इतनी पते की , कविता को कहानी चाहिए

छू जाये जो दिल को , रुक कर थोड़ी हैरानी चाहिए

बुधवार, 3 दिसंबर 2008

जीवन का ये संध्या वंदन सिखाओ

और चाची चलीं गईं । जाना तो जन्म के साथ ही तय हो जाता है , पर मौत की दस्तक हमने उस दिन ही सुन ली थी , जिस दिन उनके दोनों गुर्दे फेल होने की ख़बर मिली थी । २९नव .०८ उधर ताज में कमांडोज ने उग्रवादियों का सफाया किया ,कितने ही देशभक्त शहीद हुए , इधर ७.३०बजे मेरी चाची जी ने आखिरी साँस ली ।
उनकी मौत आशा के विपरीत नहीं थी , उन्हें तो हम उन्हीं दिनों बहुत रो चुके थे , जब रोग का पता चल गया था , बचपन से जुड़ी उनकी यादें बहुत रुला चुकी थीं । अब तो ठगे से , असहाय से , यंत्र वत उनका जाना देखते रहे ; जीवन का शाश्वत सत्य जैसे हमें जड़ कर गया हो । उग्रवादियों की वजह से जो लोग शहीद हुए , वो सारी असामयिक मौतें थीं , असामयिक मौत को सहना आसान होता ही नहीं , मन झगड़ता है ,रोता है , अचानक जीने के सहारे , जीने की गति छिन जाती है । तड़फते मन को किसी आशा की किरण की जरुरत होती है । चाचा जी की असामयिक मौत ,और चाची जी कर्म का दामन थामें रहीं ; जैसे यही जीवनी शक्ति हो । उनकी बहू ने उनकी आवाज में गाया हुआ गीत टेप करके रखा हुआ था , सुनवाया ' नी मैं तडफाँ वांग शुदाइयां , वे आ मिल कमली देया साईयाँ ' , जिसका अर्थ है , अरी , मैं बौराए हुओं के जैसे तड़फ रही हूँ , तू आ के मिल , पगली के सजन ;  आवाज़ तो कैद कर ली गई , मगर जीवन को कौन क़ैद कर सका है ।और काल उन्हें अपने साथ ले गया ।
२५ जन.०८ को उनके रोग का पता लगने पर ये कविता रोते हुए मन ने लिखी थी ...
'जीवन का ये संध्या वंदन सिखाओ '

वही हँसते गाते चेहरे
यादों को सजाते चेहरे 
पड़ गईं झुर्रियां
संध्या की तरफ़ जाते चेहरे


कभी झरतीं थीं , आशा की किरणें
जीती जागती ,परियों की सी उमंगें
वो संध्यावन्दन , किससे पूछें , वो तुम क्या गाते थे
शाम होते ही , कैसे मुस्कराते थे


मेरी यादों की किताब में
जोड़े जाते हो दर्द के किस्से
मेरी ऊँगली पकड़ लेते चेहरे
क्या यही हश्र है
मुस्कराहटें , उमंगें , तरंगें ,
बदली हैं दुःख की परछाईयों में
किससे पूछें कैसे जीते हो तन्हाईयों में
पीते हो दर्द के घूँट , संग-संग दुःख के निवाले
कोई खींचें लिए जाता है दूसरी ही अमराईयों में
जीवन का ये संध्या वंदन सिखाओ ,
डूबे जाते हो किन गहराईयों में
सब कुछ तो छूटा ,
वो यौवन , इच्छाएं , सुख की वो क्षणिकाएं
ये तो बताओ कैसे चलते हैं , तिनके-तिनके सी पगडंडियों पे

शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

सड़कों पर बिखरा है लहू


वो जो सड़कों पर बिखरा है लहू
रुक के देख , किसका है ?
तेरा हाथ , तेरा पाँव , तेरे वजूद का हिस्सा तो नहीं ?

लहू के बदले लहू
इतनी जानों का लहू ,
कितने जन्मों में चुका पायेगा ?

इतनी आहों , इतनी सिसकियों की भरपाई कैसे होगी ?
कफ़न को सेहरा समझ ,भटकती रूहों की समाई कैसे होगी ?

तराजू में तुल के मिलती है रहमत ,मरहम के बदले
क्यों बने मोहरे , वहशत के कारोबार से सुकून कैसे होगा ?

चार दिन जो जन्नत का नजारा लेते
सफर का सुकून ही सब कुछ है
क्यों जहर का सहारा लेते

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

मानवता , खून के आँसू रोती है

नफरत के काँटें क्यों बोये
ले आये ये किस पड़ाव पर

मानवता , खून के आँसू रोती है

हँसते हुए चेहरे और आँखें
बदले हैं खून की आँधी में 


उछले हैं धड़ और हाथों में
ये ऐसे मन्जर क्यों लाये


अरसे तक पीछा करते हैं
ऐसे सपने भी


रो-रो कर उठते हाथ कहो
ये किसका मातम करते हैं


सदियों तक रोयेंगे ये
ये कैसी फसलें बोई हैं


उजाले भी शर्माते तुमसे
ये ऐसे अन्धेरें क्यों लाये


करना था दिलों पर राज तुझे
चढ़ बैठा ढेर पे लाशों के


पीटता है ताली अपने ही
जमीर की घुटती साँसों पे


अपने बच्चों को क्या देगा
काले अक्षर और स्याह काली रातों सी तख्ती


निर्दोषों के खून से नहाई धरती
चलने को जमीन भी न छोडी


आसमानों की बातें करते हैं
नफरत के कांटें क्यों बोए
मानवता , खून के आँसू रोती है

बुधवार, 26 नवंबर 2008

प्रेम के रागों को अलापा करते

बेवजह भूतों को हम जिन्दा करते
क्यों फरिश्तों को न हम बुलाया करते


मरुस्थलों में लगा आग तपाया करते
क्यों वीरानों को न सजाया करते


रत्ती भर जो न मिला , दुःख को लम्बा करते
क्यों भरे पेट , भरे मन भीअघाया करते


ख़ुद ही दुश्मन बने अपने , गड़े मुर्दों को साथ चलाया करते
क्यों न दिल की ढपली पे , प्रेम के रागों को अलापा करते