मंगलवार, 30 सितंबर 2008

हम तो लिखते हैं


अमर उजाला में कविता छपने पर चेक प्राप्त हुआ ,बरबस मन ने कुछ पंक्तियाँ लिख डालीं

कौन पैसों के लिए लिखता है
हम तो लिखते हैं कि कुछ कदम चल पायें

हमको तो ये ईनाम दिखता है
चलते चलते कोई पल बहार बन आए

शब्द कब किसी की जागीर हुए
रोना हंसना बन भावों में उतर आए

शब्द फूल बन खिला करते हैं
गर दिल के रागों को जुबान मिल जाए

क्यों खर्चू ,सजा लूँ तमगों की तरह
कीमती लम्हों को थोड़ा ठहराव मिल जाए

हम तो लिखते हैं कि कुछ कदम चल पायें
वरना रुक गए थे ,ठगे से, ज़माने की रफ़्तार देखते हुए




सोमवार, 29 सितंबर 2008

सफर के सजदे में

क्यों न हम अपने संवेदन शील मन को सृजन की डोर थमा दें । दुःख रात की तरह काला और अंतहीन , सृजन क़दमों को दिशा देता ,आशा का टिमटिमाता दिया। सृजन ही जीवन है ।

कविता की आख़िरी पंक्ति को सकारात्मक ही होना है, ये मेरा ख़ुद से वायदा है , जैसे डूब डूब कर ऊपर आना ही है ।

जीवन यात्रा छोटी हो या लम्बी हो उसकी मर्जी ,इस सफर का सजदा तो अपने वश में है । अभिवादन करें तो तन मन के साथ प्रकृति भी गाती है , ठुकरातें हैं तो ऋणात्मक गूँज दूर तलक जाती है ; अन्दर कहीं कुछ मर जाता है , तूफ़ान से घिर आतें हैं । जब यात्रा ही सब कुछ है ,और एक हद तक अपने बस में भी है ,तो क्यों न इसका सजदा करें ।

सोमवार, 22 सितंबर 2008

रोशन करना था दुनिया को

इस दम को लगाना था और कहीं
बिखरी दुनिया को सजाने में

रोशन करना था दुनिया को
दम लगा दिया बिखराने में

आधार ये कैसा उठा लिया
अपने मन को ठग ,समझाने में

आधार नहीं ये,विकृति है
दुनिया के सभ्य समाजों में

ईश्वर ही खुशियाँ बांटता है
नित आ कर नये नये रूपों में

क्यों मन पर बांधें बोझ चला
सर पर रक्खे उस पत्थर में

आहा,क्या मज़ा समंदर में
तैरने में ,हंसने गाने में

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

रूठा है कुछ मुझसे


रूठा है कुछ मुझसे,
मेरा ही अपना आप कहीं

मेरा अपना ही हिस्सा है
चलता जो मेरे साथ नहीं

क्यों दूरी है ?
हम कोई दिन रात नहीं

मैं चलती हूँ जब पूरब को
चल देता है पश्चिम की ओर कहीं

कैसे बोलूँ मेरा तो
तुम बिन कोई ख्वाब नहीं

और पश्चिम में तो ,
खिलती कोई आस नहीं

जीवन तो जीवन होता है
आँसू की बरसात नहीं

फूलों को खिलना होता है
क्यों बहारों का गुंजन साथ नहीं

पेंगें लेते हम सावन की
फिर क्यों हाथों में हाथ नहीं

सोमवार, 25 अगस्त 2008

जीवन का पलड़ा भारी है

हालातों से ,संघर्षों से
तेरे मन के अंतर्द्वंदों से
जीवन का पलड़ा भारी है

भ्रमों से, विषादों से
नीरवता के कोलाहल से
जीवन का पलड़ा भारी है

तेरे अहं से,तेरे दंभ से
तेरी विष से भरी जुबानों से
जीवन का पलड़ा भारी है

तेरी जाति से, तेरे धर्म से
तेरे ऊँचें नीचे समाजों से
जीवन का पलड़ा भारी है

तेरे सुखों से,आरामों से
वैभव के साजो-सामानों से
जीवन का पलड़ा भारी है

तेरे अनुत्तरित सवालों से
कर्मों का पलड़ा भारी है
जीवन का पलड़ा भारी है

थकन लेकर

वक़्त फिसल जाता है मुठ्ठी से
बालू की तरह

हिस्से कुछ नहीं आता
हारे हुए प्यादे की तरह

झुनझुनों से बहलेंगें
तो बह जायेंगे तिनकों की तरह

उगा लेता है सब्ज़ बाग़ भी
कब्र गाहों पर

ये आदमी का हौसला है ,
चुन लेता है फूल
सीने में सब दफ़न करके

वरना चलना नहीं होगा
चलने की थकन लेकर


शुक्रवार, 22 अगस्त 2008

एक कदम दूर

एक कदम तुम दूर थे
इतनी बड़ी खाई थी
कि फुसफुसाने की आवाज़ भी आती

बस एक कदम और
और तन्हाई सज सकती थी

जाना मैने भी है
समझा तूने भी है
सदियों सा फासला सह कर 

गया वक़्त क्या कभी लौटा है
हाँ ,सज सकता है
बीते लम्हों की निशानी हो कर