शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

दवाओं को पीते रहे


हादसे क्या जान बूझ कर किए जाते कभी

जायेंगे ये किस हद तक , क्या सोच पाते कभी

अपने लिए ख़ुद ही , कोई कब्र खोदता नहीं

दूसरे के दर्द में , अपना दर्द खोजता नहीं

मत सेंकना तू रोटियाँ , आग जलती है कहीं

लकडियाँ हैं दूसरे की , तूने आगे खिसकाई कहीं

है दर्द उसके सीने में , नहीं है छलावा कोई

इन्सानियत की आँख से , नहीं होता दिखावा कोई

जब ख़ुद पर बीतती है , ठगे से ढूँढते हैं कोई देवदार कहीं

ये क्या लाया है , कर देगा तुझे भी लहुलुहान , झाड़-झंखाड़ कहीं

इन्सानियत के नाम पर , है इंसानियत शर्मिन्दा कहीं

दवाओं को पीते रहे , दुआओं को भूल आए कहीं


7 टिप्‍पणियां:

  1. दवा न पीऐं सिर्फ गजलें लिखती रहें।
    पसंद आई।

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  2. दवाओं को पीते रहे , दुआओं को भूल आए कहीं
    बहुत सही सुन्दर कहा ..

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  3. भावनाप्रद संदेश देती रचना... सुन्दर लिखा है

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  4. ऊपर सभी टिप्पणियों को रिपोस्ट करना चाहता हूं.

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