मंगलवार, 29 मार्च 2011

कर्म यज्ञ है आहुति जीवन

जात पूछो साधू की
एक ईश के बन्दे

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई
जात पात के रन्दे

राह सँकरी पहुँचे वहीं
धर्म नहीं हैं फन्दे

कर्म यज्ञ है आहुति जीवन
अपने अपने हैं हन्दे

एक नूर से उपजे हैं सब
कौन भले कौन मन्दे

रन्दे=औजार जिनसे तराशा जाता है
हन्दे =उपभोग से पहले ब्रहामण के लिये निकला जाने वाला भाग

सोमवार, 14 मार्च 2011

वो जो रोज रोज मरते हैं

मरना मना है
वो जो रोज रोज मरते हैं
लम्हा लम्हा , ज़र्रा ज़र्रा
उसका क्या ?

कर्ज मर्ज , दँगा पँगा
नशा वशा , हर्ज तर्ज़
सौ बहाने मौत के
एक बूँद ज़िन्दगी से महरूम
बेकसी , बेचारगी , लाचारगी
कटोरा लिये हाथ में
भीख माँगे उपहारों की
सीने में जँगल झाड़ हैं
भड़के चिन्गारी दावानल सी
टूट फूट , मरम्मत होती सदियों से
निदान उपचार से बेहतर है
दो बूँद जिन्दगी की पिला
अकड़ न जाए मन कहीं
टूट कर मुर्दा हुए या नश्तर बने
जिन्दगी का रस ही आँचल बने
भूल कर भी न ठोकर लगा
सीने में मचलते अरमान हैं
तुझसे ही कई तूफ़ान हैं
दिशा दिखा , दशा बदल
जिन्दगी मेहरबान है
जिन्दगी मेहरबान है

रविवार, 6 मार्च 2011

आकाश को नहीं छोड़ा करते

जिस गली जाना न हो
उसका पता नहीं पूछा करते
सो गए ज्वालामुखी
चिन्गारी को नहीं छेड़ा करते

हश्र तो एक ही होता है
फना हो कर भी , लब पे लाया नहीं करते
मेरे मौला की मर्जी क्या है
हँसते हुओं को रुलाया नहीं करते

वक्त से पहले वक्त के सफ्हे
नहीं पलटा करते
इस लम्हे से पहले उस लम्हे तक
नहीं पहुंचा करते

यूँ बियाबान से नाता
नहीं जोड़ा करते
सूख जाते हैं जड़ों से
जीवन से मुहँ नहीं मोड़ा करते

एक ही बात कही
टूटते हुए तारों ने
टूटे हुए लम्हों की गिनती में
आकाश को नहीं छोड़ा करते