बुधवार, 31 मार्च 2010

न जाने कौन सी बात

उड़न तश्तरी की ताजा पोस्ट से प्रेरणा लेकर....

न जाने कौन सी बात पहचान बने
वो मुलाकात कल्पना की उड़ान बने

पल्लवित होती बेलें , नाजुक ही सही
बढ़-बढ़ के छूने को आसमान बने

तपन गर्मी की , बौरों से लदे
पेड़ों के फलों की मिठास का गुमान बने

चाँद सूरज हैं नहीं दूर हमसे
धरती पर रोज उतरें वरदान बनें

पीड़ा में छटपटाता है हर कोई
कौन जाने प्रेरणा रोग का निदान बने

जरुरी है खुराक इसकी भी
तन्हाईं में भी होठों पर मुस्कान बने

गुरुवार, 25 मार्च 2010

अन्तिम विदाई

12 मार्च , चाचा जी ऐसे चले गए जैसे बड़े भाई के पीछे-पीछे लक्ष्मण चले गए हों | अपने लिए कितने कठोर नियम थे और दुनिया के लिए कितने नर्म दिल ! तीस साल पहले कितने ही गाँवों के सरपँच रहे ...निष्पक्ष फैसले और राजा जैसे दिल के साथ सबका आदर-सत्कार | प्रसिद्धि तो सितारों का खेल होती है , उस वक़्त सँचार के ज्यादा साधन नहीं थे ...उसी वक़्त में अपने वचन पर स्थित रहने की, अनुशासन की , फराखदिली की असली पहचान हो सकती थी | खामोशी के साथ वो समाज के लिए उदहारण का सा जीवन जी कर गए |
२४ मार्च , कितने ही लोगों की तरफ से सामाजिक संस्थाओं की तरफ से श्रद्धांजलि अर्पित की गई | उनकी छोटी पोती ने अपनी लिखी हुई डायरी के अँश सुनाये , जो बेहद सँवेदनशील थे कि जब वो छोटी थी कैसे दादा जी उसके भाई के रिजल्ट पर खुश हो कर उन्हें टोकन दिया करते थे और वो हर दिन उनके बाहर से आने का इंतजार किया करते थे ....फिर कैसे एक दिन कॉलेज से आने पर उनके आई.सी.यू.में भर्ती होने का समाचार मिला , मिलने गई तो वो ऑक्सीजन मास्क हटा कर कुछ कहना चाह रहे थे ....हाथ उठा कर आशीर्वाद देना चाह रहे थे , मगर हाथ उठा नहीं पा रहे थे और मिलने का वक़्त ख़त्म हो चुका था | और वो होंठ जो कुछ कहना चाह रहे थे ....नीले पड़ गए ..... |
मैंने चाचा जी के लिए कुछ कवितायें लिखीं थीं पर वहाँ उठ कर बोली नहीं .......

आख़िरी सफ़र है
हुजूम है साथ आया
अन्तिम विदाई देने
तोड़ के तिनका
हो जायेंगी राहें अलग
साथ छूटा मोह भी तोड़ लिया
दूर मक्खियाँ भिनभिनाने का सा स्वर
चेतना लौटी है
आह, कैसा ये सफ़र , मुँह मोड़ लिया
माली ने गुलशन था खिलाया
दिन , महीने और साल गुजर जायेंगे

छाया तो होगी मगर , बस आप नजर आयेंगे


२२ जुलाई २००१ मेरी माँ की आख़िरी रात ....जब उन्हों ने दुनिया छोड़ गए मेरे भाई बहनों और छोटे चाचा जी को याद कर कहा था ....एक एक कर चारों चले गए ....उस वक़्त मैं लिखा नहीं करती थी ...पर आज वही पंक्ति मेरी कविता की पहली पंक्ति बनी .....

एक एक कर चले गए
कुछ जाने को तैय्यार खड़े
पदचाप काल की सुन कर भी
हम सारे चुपचाप खड़े

अन्त हुआ उस युग का भी
छत्र-छाया में जिसकी थी पले
मोल अतीत का उतना ही
जितना ये अपने प्राण जले

गुम जाते हैं चेहरे तो मगर
कर्म सदा बोलते ही खड़े
प्रतिपल वो दुहाई देते हैं
जिन्दा रहते हैं अहसास बड़े


मेरे भाईजी ने अन्तिम श्रद्धांजलि दी और वो किस्सा भी सुनाया जब पन्त नगर यूनिवर्सिटी की सीनियर सिटीजन सोसाइटी ने चीफ-गेस्ट के तौर पर मेरे पिताजी को बुलाया था | उस गोष्ठी में सबने अपने बच्चों के व्यवहार पर खेद जताया था और कहा था कि बच्चों को बड़ा कर देने के बाद जायदाद का हिस्सा नहीं देना चाहिए | आखिर में , चीफ-गेस्ट होने के नाते पिता जी ने अपने विचार रखे कहा कि मेरे बुजुर्ग भाई नौकरियों के सिलसिले में अपने माँ-बाप से दूर रहे हैं , शायद इसलिए इनके बच्चों ने इन्हें अपने दादा दादी ( माँ -बाप ) की सेवा करते नहीं देखा , तभी ये संस्कार इनके अन्दर नहीं उतरे | मैं कैसे कह दूं कि बच्चों को कुछ नहीं देना चाहिए , मैनें अपने लिए कुछ नहीं रखा , पर मेरे बच्चों को छोड़ो , मेरे भतीजों के बच्चे तक मेरी सेवा करते हैं ....मेरे भाई जी ने कहा कि गर्व से मेरा सीना चौड़ा हो गया | इसके बाद भाई साहब ने मेरी लिखी हुई कविता ये कह कर सुनाई कि इसे मेरी छोटी बहन ने लिखा है ....मैंने कभी कुछ बेटियों को ये कहते सुना था कि मायका माँ-बाप से ही होता है ..बस मन ने कुछ रच डाला था .....

माँ गईं ,पापा गए
भाई ने गले से लगाया तो
मायका कायम है
बचपन यादों की मुट्ठी में
सँग-सँग आया
मायका कायम है
जाना होता है सबको ही
छाया हो घनी तो
मायका कायम है
मुश्किल से मुश्किल मोड़ों पर
जोड़ेगा , उठाएगा ढालों पर
मायका कायम है
भाई ने गले से लगाया तो
मायका कायम है
इसके साथ ही भाई साहब ने कहा कि उनके संस्कार बने रहने चाहिए ...वो मर कर भी अमर हो गए हैं |
अहसास ही वो शय है जो कविता में जीवन का रँग भरता है |

गुरुवार, 18 मार्च 2010

जरुरी नहीं के

जरुरी नहीं के
लौटें वो रास्ते
जिनसे थे गुजरे
अरमाँ के वास्ते

पलट कर कभी फिर
नहीं आने वाला
गुजरा था जो पल
रहबर के वास्ते

जिन्दा तो कर लें
कहाँ हैं वो हम
कहाँ हो वो तुम
खो गए रास्ते

जब थे खड़े हम
आँखें बिछाये
हुए न मेहरबाँ
किस्मत के रास्ते


मेरी आवाज़ में ( एक कोशिश की है )
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बुधवार, 10 मार्च 2010

दुआ सलाम बन जाती

छुअन भी सपने की
रँग प्याली में बेशुमार भर देती
ठहरे हुए पानी में
मीठी सी जल-तरँग भर देती
तपती हुई धरती पर
छिटक के चाँदनी बिखर जाती
बोझिल कदम उठते ही
पँखों की उड़ान बन जाती
सपने में देख कर सपना
खुमारी नींद की उतर जाती
गुम हो गयी थी आशना
तूलिका रँग उमँग भर जाती
कौन लिखने के लिए लिखता है
कभी किसी के लिए आसमान बन जाती
सुबह के भूले के लिए
रात होते ही , दुआ सलाम बन जाती




रविवार, 7 मार्च 2010

ये ज़िरह को तोलता

अभाव भी है बोलता
दिलों के भेद खोलता
तड़प कसक के साथ ही
आँखों में है डोलता

धरती के सीने में
ये ज़िरह को तोलता
समेटना था नभ को
ये गिरह को खोलता
पा लेते जो मुक्कमिल जहाँ
तो कौन क़दमों में जान डालता

शोर भी इसी का है
है बाँध सारे तोड़ता
सात पर्दों में रखा हुआ
अस्तित्व को झकझोरता
कैसा है ये भाव जो
सिर पे चढ़ के बोलता


अभाव भी है बोलता
दिलों के भेद खोलता
तड़प कसक के साथ ही
आँखों में है डोलता


बुधवार, 3 मार्च 2010

लरज़ते हुए लफ्ज़

क्या ब्लॉग की दुनिया में कोई ऐसा जानकार है ?....जो कन्धे के बार बार डिस्लोकेट होने के कारण जो मेंब्रेन (झिल्ली ) फट जाती है ....जिसके लिए डॉक्टर उसकी सिलाई का ऑपरेशन ही एकमात्र इलाज बताते हैं ....या फिर साथ ही साथ शैलो केप्सूल ( उथला) के लिए हड्डी कुरेद कर कन्धे के किनारे पर लगाने को कहते हैं |क्या कोई डॉक्टर कोई और उपचार बता सकता है ? आज सही राय मिलना भी मायने रखता है |जरुर बताएँ......बेटे को पाँच बार इस तकलीफ से गुजरना पड़ा....

तेरे लरज़ते हुए लफ्ज़
तेरी भर्राई हुई आवाज़
कह देती है
कि तू मुश्किल में है
है कलेजा थाम के रखना मुझे
कुछ टूट के उछला है पेशानी तक
मेरी दुआओं ने गति पकड़ी है
जिगर का टुकड़ा है , मेरे क़द से ऊँचा
कलेजे में समाया है
उड़ के आ जाती मगर
दूरियों के काबू में हूँ
मेरी सदायें सँभालेंगी तुझको
मैं तेरे आस पास ही हूँ