बुधवार, 10 मार्च 2010

दुआ सलाम बन जाती

छुअन भी सपने की
रँग प्याली में बेशुमार भर देती
ठहरे हुए पानी में
मीठी सी जल-तरँग भर देती
तपती हुई धरती पर
छिटक के चाँदनी बिखर जाती
बोझिल कदम उठते ही
पँखों की उड़ान बन जाती
सपने में देख कर सपना
खुमारी नींद की उतर जाती
गुम हो गयी थी आशना
तूलिका रँग उमँग भर जाती
कौन लिखने के लिए लिखता है
कभी किसी के लिए आसमान बन जाती
सुबह के भूले के लिए
रात होते ही , दुआ सलाम बन जाती




4 टिप्‍पणियां:

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत ।

Amitraghat ने कहा…

सुन्दर रचना..........."
amitraghat.blogspot.com

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

ठहरे हुए पानी में..मीठी सी जल-तरँग भर देती
तपती हुई धरती पर..छिटक के चाँदनी बिखर जाती.

लाजवाब भाव पिरोये हैं शारदा जी...बधाई

राज भाटिय़ा ने कहा…

सुबह के भूले के लिए
रात होते ही , दुआ सलाम बन जाती
जबाब नही आप की इस सुंदर कविता का बहुत सुंदर भाव लिये है.
धन्यवाद