बुधवार, 7 जनवरी 2009

जो थमा तो तू थमा


जो थमा तो तू थमा , वक़्त ने थमना नहीं


तू चले जो साथ इसके , इसमें है गरिमा तेरी


तू सजा ले अपनी दुनिया , आज और इस पल अभी


वक़्त है दुनिया का मेला , आज तम्बू इस जगह


तू भी बह ले साथ इसके , मौज मस्ती रंग में


कल को देखेंगे समाँ , किस जगह , किस किस तरह
जो थमा तो तू थमा , वक़्त ने थमना नहीं


वक़्त है नदिया का पानी , रुख है इसका सागर तरफ़


तू भी चल इसकी तरह से , स्वच्छ , निर्मल और धवल


लना तेरा धर्म है , सागर तरफ़ , मंजिल तरफ़
जो थमा तो तू थमा , वक़्त ने थमना नहीं


वक़्त है दुधारी तलवार , सिर पर लटकी पैनी सी
कब गिरेगी किसके सिर पर , औ कर देगी धड़ अलग
लगा ले सबको गले , राही भी तू , रहबर भी तू
जो थमा तो तू थमा , वक़्त ने थमना नहीं

4 टिप्‍पणियां:

शाश्‍वत शेखर ने कहा…

"कल को देखेंगे समाँ , किस जगह , किस किस तरह
जो थमा तो तू थमा , वक़्त ने थमना नहीं"

खुबसूरत भाव| पहली बार आपके ब्लॉग पर आया, अब आता रहूँगा|

रंजना ने कहा…

Waah ! baahut sundar !

विनय ने कहा…

जी बिल्कुल सही फ़रमा रही हैं आप ज़िन्दगी आगे बढ़ने का नाम है, रुकने का नहीं

---मेरा पृष्ठ
गुलाबी कोंपलें

"अर्श" ने कहा…

बहोत खूब लिखा है आपने ,दृढ़ और प्रबल इक्षा शक्ति को प्रर्दशित करती हुई ये कविता ... बहोत ही बढ़िया ...


अर्श